85 वर्षीय लालचंद गोदारा ने पास की एमए,1200 में से 965 अंक किए हासिल

सिरसा, 18 सितंबर। बेहतर समाज के लिए शिक्षा मुख्य अंग है और शिक्षा हासिल करने की कोई उम्र नहीं होती, यह तो बस एक उम्र का आंकड़ा है। इस बात को साबित करके दिखाया है सिरसा के 85 वर्षीय पूर्व फौजी लाल चंद गोदारा ने। एमए की डिग्री हासिल करने वाले लाल चंद के अनुसार जीवन में कोई भी मंजिल पाने के लिए शिक्षा रोशनी का काम करती है। लालचंद गोदारा ने बताया कि जब तक यह बात समझ आई तो उनकी उम्र 76 साल की हो चुकी थी।

 

पोते-पोतियां उसे कम पढ़े-लिखे होने का ताना मारते थे। बेशक उन्होंने सैनिक रहते हुए देश की सुरक्षा के लिए सीने पर गोली खाने की हिम्मत रखी, लेकिन अनपढ़ता का ताना गोली खाने से भी ज्यादा दर्द देने जैसा था। फिर ठान लिया कि पढ़ लिख कर शिक्षित समाज का हिस्सा बनूंगा। मजबूत जज्बे के भरोसे लालचंद ने 81 साल की उम्र में ग्रेजुएशन की डिग्री ली। इसे बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया। इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी में एमए में दाखिला लिया। अब लालचंद ने एमए की डिग्री हासिल कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

 

लालचंद गोदारा ने बताया कि अब वे पीएचडी या लॉ करने का अरमान पूरा करने की दौड़ में हैं। बता दें कि देश की सेवा के दौरान युद्ध में मोर्चा संभाल चुके लालचंद खेल के मैदान में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। हरियाणा मास्टर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने पदक जीतकर न केवल अपनी खेल प्रतिभा दिखाई, बल्कि युवाओं के सामने फिटनेस और हौसले की मिसाल भी पेश की।

 

लालचंद गोदारा ने बताया कि उन्होंने वर्ष 1962, 1965 और 1971 की लड़ाइयों में सैनिक के रूप में हिस्सा लिया। सेना में सेवाएं देने के बाद वे वर्ष 1972 से 2002 तक परिवहन विभाग में यार्ड मास्टर के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद आमतौर पर जिस उम्र में लोग आराम को प्राथमिकता देते हैं, उस दौर में लालचंद ने खेलों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया।लालचंद के नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में करीब 200 पदक दर्ज हैं। इनमें करीब 150 स्वर्ण पदक हैं, जबकि 30 सिल्वर और 20 ब्रॉन्ज मेडल भी उन्होंने अपने नाम किए हैं। उनका कहना है कि शरीर को सक्रिय रखने के लिए उम्र बाधा नहीं बननी चाहिए। नियमित अभ्यास, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति समर्पण हो तो बढ़ती उम्र में भी व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है।

 

उनकी मेहनत का परिणाम हरियाणा मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में देखने को मिला। लालचंद के जीवन की खास बात यह है कि खेलों में उनकी सक्रियता सेवानिवृत्ति के बाद और बढ़ी। सैन्य सेवा और नौकरी के लंबे सफर के बाद उन्होंने खाली समय को आराम में बिताने के बजाय मैदान को चुना। उम्र के साथ शारीरिक चुनौतियां बढ़ीं, लेकिन उन्होंने नियमित अभ्यास जारी रखा।

 

यही कारण है कि 85 वर्ष की उम्र में भी दौड़, गोला फैंक और हैमर थ्रो जैसी स्पर्धाओं में पदक हासिल कर रहे हैं।पूर्व सैनिक लाल चंद गोदारा ने बताया कि उन्होंने 1962, 65 और 71 की लड़ाई में सैनिक के रूप में काम करके दुश्मन के छक्के छुड़ाए। नौकरी पूरी करने के बाद उन्होंने हैमर और डिसकस थ्रो खेलना शुरू किया तो अब तक 200 से ज्यादा पदक जीत चुके हैं।रोजाना 11 किलोमीटर की दौड़ लगाकर खुद में 85 की उम्र में 18 जैसा जोश बनाए हुए हैं।

 

उनका कहना है कि आलसी को न कभी विद्या मिलती है न ही आराम। इसलिए जिस उम्र में लोग आराम करते हैं, उस आयु में पढ़ रहे हैं। लालचंद गोदारा सिर्फ खेलों में ही नहीं, बल्कि वे सामाजिक कार्यों में भी सदैव अग्रणी रहते हैं। 15 अगस्त व 26 जनवरी पर होने वाले जिला स्तरीय कार्यक्रमों में परेड में भी शामिल होते हैं। पौधारोपण, शिक्षा, खेल, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान, नशा मुक्ति अभियान, सफाई अभियान, सडक़ सुरक्षा अभियान में भी वे हमेशा आगे रहकर लोगों को जागरूक करते हैं।

Pauline Roussel

Je suis Pauline Roussel, journaliste culinaire et consultante en arts de la table depuis plus de quinze ans. Diplomee en management de l’hotellerie-restauration a l’Institut Paul Bocuse et ancienne critique gastronomique pour un guide regional Gault&Millau, j’ai explore cuisines de terroir et tables etoilees. Mon travail m’a menee des bistrots parisiens aux auberges familiales italiennes, avec une attention particuliere pour le lien entre gastronomie, voyage et art de recevoir a la maison. Je partage ici mes experiences concretes, mes methodes d’organisation et mes adresses preferees pour aider chacun a cuisiner mieux et accueillir avec confiance.

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